गाजियाबाद की त्रासदी : क्या आपका बच्चा मोबाइल की आभासी दुनिया में खो रहा है?

डर और डांट नहीं, सही समझ और इलाज है ज़रूरी

डॉ. अभिषेक द्विवेदी, निदेशक – मंथन हॉस्पिटल, प्रयागराज

नमस्ते प्रयागराज,

हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा आत्महत्या की हृदयविदारक घटना ने हम सभी के सामने एक डरावनी सच्चाई पेश की है। ऑनलाइन गेमिंग और मोबाइल एडिक्शन (लत) आज केवल एक आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है।

एक चिकित्सक के तौर पर, मैं अक्सर देखता हूँ कि माता-पिता बच्चों के हाथ में मोबाइल यह सोचकर थमा देते हैं कि बच्चा शांत रहेगा या कुछ सीखेगा। लेकिन अनजाने में हम उन्हें एक ऐसे ‘भंवर’ में धकेल रहे हैं, जहाँ से वापसी का रास्ता बहुत कठिन होता जा रहा है।

एम्स (AIIMS) की चेतावनी : मोबाइल एडिक्शन ‘जिद’ नहीं, एक ‘बीमारी’ है

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के ‘बिहेवियरल एडिक्शन्स क्लिनिक’ के शोध और मेरे अपने अनुभवों के आधार पर, बच्चों में मोबाइल एडिक्शन के 3 मुख्य स्वरूप सामने आ रहे हैं :

  • हिंसक और डरावना कंटेंट : बच्चे अक्सर मोबाइल पर हिंसा या डरावने वीडियो देखते हैं, जिससे उनमें जिज्ञासा के साथ-साथ एक अजीब सा डर बैठ जाता है। वे माता-पिता को अपना दुश्मन समझने लगते हैं।
  • सोशल मीडिया और बाडी-इमेज : किशोर बच्चे (खासकर लड़कियां) रील्स और सोशल मीडिया पर अपनी ‘छवि’ को लेकर इतने तनाव में आ जाते हैं कि उनकी नींद और पढ़ाई दोनों बुरी तरह प्रभावित होती हैं।
  • गेमिंग का जुनून : गेम्स की आभासी दुनिया बच्चों को इतना उत्तेजक बना देती है कि मोबाइल छीनने पर वे आत्मघाती कदम उठाने या सामान तोड़फोड़ करने तक पर उतारू हो जाते हैं।

इन संकेतों को पहचानें (Warning Signs for Parents)

यदि आपके बच्चे में ये लक्षण दिख रहे हैं, तो सावधान हो जाएं :

  • अचानक स्वभाव में चिड़चिड़ापन या आक्रामकता।
  • मोबाइल छीनने पर ज़रूरत से ज़्यादा गुस्सा करना।
  • खाने-पीने और नींद में भारी बदलाव।
  • पढ़ाई में लगातार गिरावट और दोस्तों-रिश्तेदारों से कट जाना।

समाधान : डर और डांट नहीं, संवाद है ज़रूरी

एम्स विशेषज्ञों और मंथन हॉस्पिटल की सलाह है कि इस लत का इलाज ‘मार-पीट’ या ‘डर’ से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से होना चाहिए :

  • डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) : बच्चों का स्क्रीन-टाइम चरणबद्ध तरीके से कम करें। अचानक फोन छीनने से बच्चा और आक्रामक हो सकता है।
  • ऑफलाइन गतिविधियां जोड़ें : बच्चों को ड्राइंग, डायरी लिखने, कहानी की किताबें पढ़ने या आउटडोर खेलों (Physical Sports) के लिए प्रेरित करें।
  • ‘बेडरूम में मोबाइल नहीं’ का नियम : सोते समय मोबाइल का इस्तेमाल मस्तिष्क की कार्यक्षमता को खत्म कर देता है। रात को मोबाइल बच्चों से दूर रखें।
  • क्वालिटी टाइम (Quality Time) : बच्चों से बात करें। उन्हें महसूस होना चाहिए कि आप उनकी समस्या को समझ रहे हैं, न कि उन्हें जज कर रहे हैं।

अभिभावकों के लिए मेरा विशेष संदेश :

गाजियाबाद की घटना हमें चेतावनी दे रही है कि मोबाइल आज के दौर का ‘नया नशा’ है। अगर आपका बच्चा मोबाइल के बिना बेचैन हो रहा है या असामान्य व्यवहार कर रहा है, तो इसे केवल ‘बचपना’ न समझें। उसे काउंसलिंग और विशेषज्ञ की सलाह की ज़रूरत हो सकती है।

मंथन हॉस्पिटल में हम बच्चों के व्यवहारिक बदलावों और मानसिक स्वास्थ्य के लिए सदैव तत्पर हैं। आइए, अपने बच्चों को इस ‘आभासी दलदल’ से निकालें और उन्हें फिर से मैदानों और किताबों की दुनिया में वापस लाएं।

सतर्क रहें, जागरूक रहें।

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  • मंथन हॉस्पिटल : अरैल मोड़, नैनी, प्रयागराज 📞 आपातकालीन संपर्क: 0532-4509975 | 7752801224